फिर आइ है याद वतन की, कुछ यादें ताज़ा कर लू हिंदी से पहचान है मेरी, अब हिंदी को पहचान भी दूँ२) अंग्रेज़ी की पतंग उड़ा कर, टिंकल टिंकल तान सुनाकर, महसूस किया था जो गौरव, शाबाशी अपनोकी पाकर, क्यों ना अपने बच्चों को भी, दे दे आज वही अवसर, क्यों ना भर दूँ डिंगेContinue reading “स्वरचित कविता”