फिर आइ है याद वतन की, कुछ यादें ताज़ा कर लू
हिंदी से पहचान है मेरी, अब हिंदी को पहचान भी दूँ२)
अंग्रेज़ी की पतंग उड़ा कर, टिंकल टिंकल तान सुनाकर,
महसूस किया था जो गौरव, शाबाशी अपनोकी पाकर,
क्यों ना अपने बच्चों को भी, दे दे आज वही अवसर,
क्यों ना भर दूँ डिंगे इनमे, हिंदी के कुछ गीत सिखा कर, (२)
जिस देश पर इतना नाज़ था हमको,
तोड़ गये वै पचिम के,
कूटनीत का जाल बिछा कर, किया आक्रमण हिंदी पर,
छोड़ी हमने भाषा अपनी, सिमट गये अंग्रेज़ी पर
भाषा तो भाषा है सबकी, बैर नहीं है भाषा से,
हम तो अपनी हिंदी को, पहचान दिखाने आए हैं
अजनबीयो का रंज नही हम, अपनो को रिझाने आये हैं(२)
चलो हर्ष के इस दिवस पर, हिंदी का झंडा लहराए,
सुन्न पड़ी इस हिंदी को भी, दुनिया में पहचान दिलाए,
हिंदुस्तान के वंशज हैं अब, हिंदी का एक बिगुल बजायें,
कर्मभूमि के इस सागर मैं, हिंदी का इतिहास बनाए(2)
फिर आइ है याद वतन की, कुछ यादें ताज़ा कर लूँ,
हिंदी से पहचान है मेरी, अब हिंदी को पहचान मैं दूँ(२)
लेखक: मयंक जैन